ऐ मेरे साँवरिया!

Krishna

हे साँवरे…..
तेरी रहमत देख कर मेरी आँख भर आती है !!
हाथ उठ ने से पहले ही दुआ कुबूल हो जाती है !!!!

ये तो ज़मीन की फितरत है कि इस पर गिरे हर चीज को अपने मेँ ही समा लेती है!!
वरना, तेरी याद मेँ गिरे आशुओँ का एक अलग ही समन्दर होता!!!!

श्री यमुना जी की आरती

ऊँ जै यमुना माता , हरि ऊँ जै यमुना माता , नो नहावे फल पावे सुखसुख की दाता ।
ऊँ जै यमुना माता…………………………
पवन श्री यमुना जल शीतल अगम बहै धारा , जो जन शरण से कर दिया निस्तारा ।
ऊँ जै यमुना माता…………………………
जो जन प्रातः ही उठकर नित्य स्नानकरे , यम के त्रास न पावे जो नित्य ध्यान करे ।
ऊँ जै यमुना माता…………………………
कलिकाल में महिमा तुम्हारी अटल रही , तुम्हारा बड़ा महातम चारों वेद कही ।
ऊँ जै यमुना माता…………………………
आन तुम्हारे माता प्रभु अवतार लियो , नित्य निर्मल जल पीकर कंस को मार दियो ।
ऊँ जै यमुना माता…………………………
नमो मात भय हरणी शुभ मंगल करणी , मन ‘बेचैन ’ भया है तुम बिन वैतरणी ।
ऊँ जै यमुना माता…………………………

श्रीकृष्ण जी की आरती

ॐ जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे.
भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे.
परमानन्द मुरारी मोहन गिरधारी.
जय रस रास बिहारी जय जय गिरधारी.
ॐ जय श्री कृष्ण हरे प्रभु श्री कृष्ण हरे.
कर कंकन कटि सोहत कानन में बाला.
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे बनमाला.
ॐ जय श्री कृष्ण हरे प्रभु जय श्री कृष्ण हरे
दीन सुदामा तारे, दरिद्रों के दुखटारे.
जग के फ़ंद छुड़ाए, भव सागर तारे.
ॐ जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे.
हिरण्यकश्यप संहारे नरहरि रुप धरे.
पाहन से प्रभु प्रगटे जम के बीच परे.
केशी कंस विदारे नल कूबर तारे.
दामोदर छवि सुन्दर भगतन के प्यारे.
काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे.
फ़न नाचा करते नागन मन मोहे.
राज्य उग्रसेन पाये माता शोक हरे.
द्रुपद सुता पत राखी करुणा लाज भरे.
ॐ जय श्री कृष्ण हरे.

आरती कुंज विहारी की

आरती कुंजबिहारी की. श्रीगिरधर कृष्णमुरारी की.
गले में बैजंतीमाला, बजावै मुरलि मधुर बाला.
श्रवन में कुण्डल झलकाला, नन्द केआनँद नँदलाला.
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली.
लतन में ठाढ़े वनमाली.
भ्रमर-सी अलक, कस्तूरी-तिलक, चंद्र-सी झलक,
ललित छबि स्यामा प्यारी की. श्रीगिरधर कृष्णमुरारी की….
कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसै,
गगन सों सुमन रासि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिनी संग.
अतुल रति गोपकुमारी की, श्रीगिरधर कृष्णमुरारी की….
जहाँ ते प्रकट भई गंगा, सकल-मल-हारिणि श्रीगंगा.
स्मरन ते होत मोह-भंगा.
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच
चरन छबि श्रीबनवारी की श्रीगिरधरकृष्णमुरारी की.
चमकती उज्जवल तट रेनू, बज रही बृदावन बेनू
चँहू दिस गोपि ग्वाल धेनू
हँसत मृदु मंद , चाँदनी चँद कटत भव- फ़ंद
टेर सुनु दीन दुखारी की. श्रीगिरधर कृष्ण मुरारी की….
आरती कुंज बिहारी की. श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की….

श्री राधारानी जी की आरती

आरती श्री वृषभानुसुता की।
मन्जु मूर्ति मोहन ममता की। आरती..
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,
विमल विवेक विराग विकासिनि,
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,
सुन्दरतम छवि सुन्दतरा की॥ आरती..
मुनि मनमोहन मोहन मोहनि,
मधुर मनोहर मूरति सोहनि,
अविरल प्रेम अमित रस दोहनि,
प्रिय अति सदा सखी ललिता की॥ आरती..
संतत सेव्य संत मुनिजन की,
आकर अमित दिव्यगुन गन की,
आकर्षिणी कृष्ण तन मन की,
अति अमूल्य सम्पति समता की॥ आरती..
कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि,
चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि,
जगजननि जग दु:ख निवारिणि,
आदि अनादि शक्ति विभुता की॥
आरती…..

श्रीराधा चालिसा Shri Radha Chalisha

-दोहा –
श्री राधे वृषभानुजा, भक्तिन प्राणाधार, वृंदा विपिन विहारिणी, प्रणवो बारंबार |
जैसो तैसो रावरौ, कृष्णा प्रिय सुख धाम, चरण शरण निज दीजिये सुन्दर सुखद ललाम ||

-चौपाई-
जय वृषभानु कुँवरि श्री श्यामा, कीरति नंदनी शोभा धामा |
नित्य बिहारिनि श्यामा अधारा, अमित मोद मंगल दातारा ||
रास विलासिनि रस विस्तारिनि, सहचरि सुभग यूथ मन भाविनि |
नत्य किशोरी राधा गोरी, श्याम प्राण धन अति जिय भोरी ||
करुणा सागर हिय उमंगिनी, ललितादिक सखियन की संगिनी |
दिनकर कन्या कूल विहारिनि, कृष्णप्राण प्रिय हिय हुल्सावनि ||
नित्य श्याम तुम्हारो गुण गावै, राधा राधा कहि हरषावै |
मुरली में नित नाम उचारे, तुम कारण लीला वपु धारे ||
प्रेम स्वरूपण स्वरूपिणी अति सुकुमारी, श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी |
नवल किशोरी अति छवि धामा, धूति लघु लग कोटि रति कामा ||
गौरांगी शशि निंदक बदना, सुभग चपल अनियारे नयना |
जावक युत युग पंकज चरना, नुपुर धुनि प्रीतम मन हरना ||
संतत सहचरी सेवा करहि, महा मोद मंगल मन भरहि |
रसिकन जीवन प्राण अधारा, राधा नाम सकल सुख सारा ||
अगम अगोचर नित्य स्वरूपा, धयान धरत निशिदिन ब्रज भूपा |
उपजेउ जासु अंश गुण खानी, कोटिन उमा रमा बह्मानी ||
नित्य धाम गौलोक विहारिनी, जन रक्षक दुख दोष नासविनी |
शिव आज मुनि सनकादिक, नारद पार नापाय शेष अरू शारद ||
राधा शुभ गुण रूप उजारी, निरखि प्रसन्न होत वनवारी |
व्रज जीवन धन राधा रानी, महिमा अमित ना जाय बखानी ||
प्रीतम संग दीई गलबाही, बिहरत नित्य वृंदावन माही |
राधा कृष्ण कृष्ण कहै राधा, एक रूप दोउ प्रीत अगाधा ||
श्री राधा मोहन मन हरनी, जन सुख दायक प्रफुलित बदनी |
कोटिक रूप धरे नन्द नंदा, दर्श करन हित गोकुल चंदा ||
रास केलि करि रिझावे, मान करौ जब अति दुःख पावे |
प्रफुलित होत दर्श जब पावे, विविध भांति नित विनय सुनावे ||
वृन्दारण्य विहारिनी श्यामा, नाम लेत पूरण सब कामा |
कोटिन यज्ञ तपस्या करहू, विविध नेम व्रत हिय में धरहू ||
तऊ ना श्याम भक्तहि अपनावे, जब लगी राधा नाम ना गावे |
वृंदावन विपिन स्वामिनी राधा, लीला वपु तब अमित अगाधा ||
स्वयं कृष्ण पवै नही पारा, और तुम्हे को जानन हारा |
श्री राधा रस प्रीति अभेदा, सादर गान करत नित वेदा ||
राधा त्यागि कृष्ण को भजि है, ते सपनेहु जग जलधि ना तरी है |
कीरति कुवरि लाडिली राधा, सुमिरत सकल मिटहि भाव बाधा ||
नाम अमंगल मूल नसावन, त्रिविध हर हरि मन भावन |
राधा नाम लेय जो कोई, सहजहि दामोदर बस होई ||
राधा नाम परम सुखदाई, भजताही कृपा करहि युदुराई |
यशुमाति नन्दन पीछे फिराहि, जो कोउ राधा नाम सुमिराहे ||
रास विहारिनी श्यामा प्यारी, करहु कृपा बरसाने वारी |
वृंदावन है शरण तिहारी, जय जय जय वृषभानु दुलारी ||

-दोहा-
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम |
करहु निरंतर वास में, श्री वृंदावन धाम ||

श्रीकृष्ण चालिसा

-दोहा-
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओदीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीरभै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥

दोहा:
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथचारि॥